“मृत्यु और धर्म” – ओशो

मृत्यु केवल मनुष्य के लिए है। इसे थोड़ा समझ लें। पशु भी मरते है, पौधे भी मरते है, लेकिन मृत्यु मानवीय घटना है। पौधे मरते हैं, लेकिन उन्हें अपनी मृत्यु का कोई बोध नहीं है। पशु भी मरते हैं, लेकिन अपनी मृत्यु के संबंध में चिंतन करने में असमर्थ है।
तो मृत्यु केवल मनुष्य की ही होती है, क्योंकि मनुष्य जानकर मरता है जानते हुए मरता है। मृत्यु निश्‍चित है, ऐसा बोध मनुष्य को है। चाहे मनुष्य कितना ही भुलाने की कोशिश करे, चाहे कितना ही अपने को छिपाये, पलायन करे, चाहे कितने ही आयोजन करे सुरक्षा के, भुलावे के; लेकिन हृदय की गहराई में मनुष्य जानता है कि मृत्यु से बचने का कोई उपाय नहीं है।
मृत्यु के संबंध में पहली बात तो यह खयाल में ले लेनी चाहिए कि मनुष्य अकेला प्राणी है जो मरता है। मरते तो पौधे और पशु भी है, लेकिन उनके मरने का भी बोध मनुष्य को होता है, उन्हें नहीं होता। उनके लिए मृत्यु एक अचेतन घटना है। और इसलिए पौधे और पशु धर्म को जन्म देने में असमर्थ हैं।

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“Why Is There So Much Frustration !” – OSHO

Frustration is just a shadow which follows expectation. If you don’t expect even for a single moment, if you are in a state of mind where there is no expectation, then it is simple. You ask a question and the answer comes; there is a fulfillment. But if you ask with any expectations you will be frustrated by the answer.
Everything we do, we do with expectations. If I love someone, an expectation enters without my even knowing it. I begin to expect love in return. I have not yet loved, I have not grown into love yet, but the expectation has come and now it will destroy the whole thing. Love creates more frustration than anything else in the world because, with love, you are in a utopia of expectation. You have not even been on the journey yet and already you have begun to think of the return home.

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“आनंद की दिशा” – ओशो

मैं आप से ही पूछना चाहता हूं कि क्या आप वस्तुओं के संग्रह से ही संतुष्ट होना चाहते हैं, या कि चेतना के विकास की भी प्यास आप के भीतर है जो मात्र वस्तुओं में ही संतुष्टि सोचता है वह अंततः असंतोष के और कुछ भी नहीं पाता है, क्योंकि वस्तुएं तो केवल सुविधा ही दे सकती हैं, और निश्चय ही सुविधा और संतोष में बहुत भेद है। सुविधा कष्ट का अभाव है, संतोष आनंद की उपलिंध है।
आपका हृदय क्या चाहता है आपके प्राणों की प्यास क्या है आपके श्वासों की तलाश क्या है क्या कभी आपने अपने आपसे ये प्रश्न पूछे हैं यदि नहीं, तो मुझे पूछने दें। यदि आप मुझसे पूछें तो मैं कहूंगा- ‘उसे पाना चाहता हूं जिसे पाकर फिर कुछ और पाने को नहीं रह जाता।’ क्या मेरा ही उत्तर आपकी अंतरात्माओं में भी नहीं उठता है
यह मैं आपसे ही नहीं पूछ रहा हूं, और भी हजारों लोगों से पूछता हूं और पाता हूं कि सभी मानव-हृदय समान हैं और उनकी आत्यंतिक चाह भी समान ही है। आत्मा आनंद चाहती है- पूर्ण आनंद, क्योंकि तभी सभी चाहों का विश्राम आ सकता है। जहां चाह है, वहां दुःख है क्योंकि वहां अभाव है।

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“शिक्षा का लक्ष्य !” – ओशो

जीवन शिक्षा का लक्ष्य है, मात्र आजीविका नहीं। जीवन के ही लिए आजीविका का मूल्य है। आजीविका अपने आप में तो कोई अर्थ नहीं रखती है। पर साधन ही अज्ञानवश अनेक बार साध्य बन जाते हैं। ऐसा ही शिक्षा में भी हुआ है। आजीविका लक्ष्य बन गई है। जैसे मनुष्य जीने के लिए न खाता हो, वरन खाने के लिए ही जीता हो। आज की शिक्षा पर यदि कोई विचार करेगा तो यह निष्कर्ष अपरिहार्य है।
क्या मैं कहूं कि आज की शिक्षा की इस भूल के अतिरिक्त और कोई भूल नहीं है लेकिन यह भूल बहुत बड़ी है। यह भूल वैसी ही है, जैसे कोई किसी मृत व्यक्ति के संबंध में कहे कि इस देह में और तो सब ठीक है, केवल प्राण नहीं है।
हमारी शिक्षा अभी ऐसा ही शरीर है, जिसमें प्राण नहीं है, क्योंकि आजीविका जीवन की देह-मात्र ही है। शिक्षा तब सप्रमाण होगी, जब वह आजीविका ही नहीं, जीवन को भी सिखाएगी। जीवन सिखाने का अर्थ है, आत्मा को सिखाना।

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“दुःख और कष्ट !” – ओशो

गरीब आदमी कष्ट में होता है, दुख में नहीं होता। अमीर आदमी कष्ट में नहीं होता, दुख में होता है। कष्ट का मतलब है अभाव और दुख का मतलब है, भाव। कष्ट हम उस चीज से उठाते हैं, जो हमें नहीं मिली है और जिसमें हमें आशा है कि मिल जाये तो सुख मिलेगा। इसलिए गरीब आदमी हमेशा आशा में होता है, सुख मिलेगा, आज नहीं कल, कल नहीं परसों; इस जन्म में नहीं, अगले जन्म में, मगर सुख मिलेगा। यह आशा उसके भीतर एक थिरकन बनी रहती है। कितना ही कष्ट हो, अभाव हो, वह झेल लेता है, इस आशा के सहारे कि आज है कष्ट, कल होगा सुख। आज को गुजार देना है। कल की आशा उसे खींचे लिए चली जाती है। फिर एक दिन यही आदमी अमीर हो जाता है।
अमीर का मतलब, जो—जो इसने सोचा था आशा में, वह सब हाथ में आ जाता है। इस जगत में इससे बड़ी कोई दुर्घटना नहीं है, जब आशा आपके हाथ में आ जाती है। तब तत्सण सब फ्रस्ट्रेशन हो जाता है, सब विषाद हो जाता है। क्योंकि इतनी आशाएं बांधी थीं, इतने लंबे—लंबे सपने देखे थे, वे सब तिरोहित हो जाते हैं। हाथ में कोहिनूर आ जाता है, सिर्फ पत्थर का एक टुकड़ा मालूम पड़ता है। सब आशाएं खो गयीं। अब क्या होगा? अमीर आदमी इस दुख में पड़ जाता है कि अब क्या होगा? अब क्या करना है? कोई आशा नहीं दिखायी पड़ती आगे।

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“सत्य की खोज की दिशाएं: विचार और दर्शन” – ओशो

सत्य की खोज की दो दिशाएं हैं- एक विचार की, एक दर्शन की। विचार-मार्ग चक्रीय है। उसमें गति तो बहुत होती है, पर गंतव्य कभी भी नहीं आता। वह दिशा भ्रामक और मिथ्या है। जो उसमें पड़ते हैं, वे मतों में ही उलझकर रह जाते हैं। मत और सत्य भिन्न बातें हैं। मत बौद्धिक धारणा है, जबकि सत्य समग्र प्राणों की अनुभूति में बदल जाते हैं। तार्किक हवाओं के रुख पर उनकी स्थिति निर्भर करती है, उनमें कोई थिरता नहीं होती। सत्य परिवर्तित नहीं होता है। उसकी उपलिंध शाश्वत और सनातन में प्रतिष्ठा देती है।
विचार का मार्ग उधार है। दूसरों के विचारों को ही उसमें निज की संपत्ति मानकर चलना होता है। उनके ही ऊहापोह और नए-नए संयोगों को मिलाकर मौलिकता की आत्मवंचना पैदा की जाती है, जबकि विचार कभी भी मौलिक नहीं हो सकते हैं। दर्शन ही मौलिक होता है, क्योंकि उसका जन्म स्वयं की अंतर्दृष्टि से होता है।

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“अहिंसा क्या है?” – ओशो

अहिंसा शब्द की नकारात्मकता ने बहुत भ्रांति को जन्म दिया है। वह शब्द तो नकारात्मक है, पर अनुभूति नकारात्मक नहीं है। वह अनुभूति शुद्ध प्रेम की है। प्रेम राग हो तो अशुद्ध है, प्रेम राग न हो तो शुद्ध है। राग-युक्त प्रेम किसी के प्रति होता है, राग-मुक्त प्रेम सबके प्रति होता है। सच यह है कि वह किसी के प्रति नहीं होता है। बस, केवल होता है। प्रेम के दो रूप हैं। प्रेम संबंध हो तो राग होता है। प्रेम स्वभाव हो, स्थिति हो तो, वीतराग होता है। यह वीतराग प्रेम ही अहिंसा है।
प्रेम के संबंध से स्वभाव में परिवर्तन अहिंसा की साधना है। वह हिंसा का त्याग नहीं, प्रेम का स्फुरण है। इस स्फुरण में हिंसा तो अपने आप छूट जाती है, उसे छोड़ने के लिए अलग से कोई आयोजन नहीं करना पड़ता है। जिस साधना में हिंसा को भी छोड़ने की चेष्टा करनी पड़े वह साधना सत्य नहीं है।

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“विचार के जन्म के लिए विचारों से मुक्ति !” – ओशो

विचार-शक्ति के संबंध में आप जानना चाहते हैं निश्चय ही विचार से बड़ी और कोई शक्ति नहीं। विचार व्यक्तित्व का प्राण है। उसके केंद्र पर ही जीवन का प्रवाह घूमता है। मनुष्य में वही सब प्रकट होता है, जिसके बीज वह विचार की भूमि में बोता है। विचार की सचेतना ही मनुष्य को अन्य पशुओं से पृथक भी करती है। लेकिन यह स्मरण रहे कि विचारों से घिरे होने और विचार की शक्ति में बड़ा भेद है;भेद ही नहीं, विरोध भी है।
विचारों से जो जितना घिरा होता है, वह विचार करने से उतना ही असमर्थ और अशक्त हो जाता है। विचारों की भीड़ चित्त को अंततः विक्षिप्त करती है। विक्षिप्तता विचारों की अराजक भीड़ ही तो है! शायद इसीलिए जगत में जितने विचार बढ़ते जाते हैं, उतनी ही विक्षिप्तता भी अपनी जड़ें जमाती जाती है। विचारों का आच्छादन विचार-शक्ति को ढांक लेता है और निष्प्राण कर देता है। विचारों का सहज स्फुरण विचारों के बोझ से निःसत्व हो जाता है। विचारों के बादल विचार-शक्ति के निर्मल आकाश को धूमिल कर देते हैं। जैसे वर्षा में आकाश में घिर आए बादलों को ही कोई आकाश समझ ले, ऐसी ही भूल विचारों को ही विचार शक्ति समझने में हो जाती है।

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ओशो सिद्धार्थ जी का साक्षात्कार (Interview) !

ओशो से बिल्कुल अलग नहीं है। ओशोधारा ओशो की ही परंपरा में है। जब भी कोई युगपुरुष आता है तो उसके बाद एक स्कूल तैयार हो जाता है जो कहता है कि आखिरी गुरु हो गया और अब आगे किसी गुरु की जरूरत नहीं है। जैसे बुद्ध आए, तो कहा गया कि वह आखिरी बुद्ध हैं। लेकिन बुद्ध के बाद मंजूश्री ने कहा कि परंपरा को अगर आगे ले जाना है तो आगे भी गुरु की जरूरत होगी। इसलिए मंजूश्री के साथ जो लोग चले, उन्हें महायानी कहा गया यानी गुरु एक जहाज की तरह होता है जिसमें अनेक लोग सवार होकर भवसागर को पार करते हैं। लेकिन बाकी शिष्यों ने कहा कि बुद्ध ने जो कहा, उसी को समझना काफी है। उन लोगों को हीनयान कहा गया। करीब-करीब सभी गुरुओं के साथ यही हुआ। हजरत मुहम्मद के साथ भी यही हुआ। लेकिन उनके बाद मौला अली से सूफियों की जीवंत परंपरा चली। सूफी भी गुरु परंपरा में विश्वास करते हैं। ओशो भी विदा हुए तो लोग ऐसी ही बात करने लगे लेकिन हम लोगों ने महसूस किया कि शास्त्र के आधार पर परंपरा जीवित नहीं रह सकती, शास्ता (बुद्ध पुरुष) के आधार पर जीवित रह सकती है। यही सोचकर मैंने ओशोधारा की शुरुआत की। फिर इसमें ओशो शैलेंद्र जी और मां प्रिया जुड़ीं।

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“विज्ञान: विश्वास से विवेक की ओर” – ओशो

हमारी चेतना में हो रही इस सारी उथल-पुथल, अराजकता, क्रांति और नए के जन्म की संभावना का केंद्र और आधार विज्ञान है। विज्ञान के आलोक ने हमारी आंखें खोल दी हैं और हमारी नींद तोड़ दी है। उसने ही हमसे हमारे बहुत-से दीर्घ पोषित स्वप्न छीन लिए हैं और बहुत से वस्त्र भी और हमारे स्वयं के समक्ष ही नग्न खड़ा कर दिया है, जैसे किसी ने हमें झकझोर कर अर्धरात्रि में जगा दिया हो। ऐसे ही विज्ञान ने हमें जगा दिया है।
विज्ञान ने मनुष्य का बचपन छीन लिया है और उसे प्रौढ़ता दे दी है। उसकी ही खोजों और निष्पत्तियों ने हमें हमारी परंपरागत और रूढ़िबद्ध चिंतना से मुक्त कर दिया है, जो वस्तुतः चिंतना नहीं, मात्र चिंतन का मिथ्या आभास ही थी; क्योंकि जो विचार स्वतंत्र न हो वह विचार ही नहीं होता है। सदियों-सदियों से जो अंधविश्वास मकड़ी के जालों की भांति हमें घेरे हुए थे, उसने उन्हें तोड़ दिया है, और यह संभव हो सका है कि मनुष्य का मन विश्वास की कारा से मुक्त होकर विवेक की ओर अग्रसर हो सके।
कल तक के इतिहास को हम विश्वास-काल कह सकते हैं। आनेवाला समय विवेक का होगा।

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“कार्यकर्ताओं के लिए सुझाव !” – ओशो

जब भी कोई संदेश पहुंचाने के किसी काम में संलग्न होता है तो संदेश पहुंचाना अनिवार्य रूप से एक आत्मक्रांति बननी शुरू हो जाती है। तब उसका व्यवहार, उसका उठना-बैठना, उसका बोलना, उसके संबंध, सब महत्वपूर्ण हो जाते हैं। और वे उसी अर्थ में महत्वपूर्ण हो जाते हैं जितनी बड़ी बात वह पहुंचाने के लिए उत्सुक हुआ है। वह वाहक बन रहा है, वह वाहन बन रहा है किसी बड़े विचार का। तो उस बड़े विचार के अनुकूल उसे अपने व्यक्तित्व को जमाने की भी जरूरत होती है। नहीं तो अक्सर यह होता है कि विचार के प्रभाव में हम उसे पहुंचाना शुरू कर देते हैं और हम यह भूल ही जाते हैं कि हम उसे पहुंचाने की पात्रता स्वयं के भीतर खड़ी नहीं कर रहे हैं। इस पात्रता पर भी ध्यान देना जरूरी है।
साधक का काम उतना बड़ा नहीं है जितना कार्यकर्त्ता का बड़ा है। साधक अकेला है, अपने में जीता है, अपने लिए कुछ कर रहा है। कार्यकर्त्ता ने और भी बड़ी जिम्मेवारी ली है। वह साधक भी है और जो उसे प्रीतिकर लगा है उसे पहुंचाने के लिए वह माध्यम भी बन रहा है।

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“What is Inner Voice?” – OSHO

The first thing: the inner voice is not a voice, it is silence. It says nothing. It shows something, but it says nothing. It gestures towards something, but it says nothing. The inner voice is not a voice. If you are still hearing some voice, it is not inner. ‘Inner voice’ is a misnomer, it is not the right word. Only silence is inner. All voices are from the outside.

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“आतंकवादः कारण और निवारण” – ओशो सिद्धार्थ ‘औलिया’

गुरु से जुड़ोगे तो सिद्धि होगी, अनुभव होगा, अपने अनुभव से जिन्दगी को जियोगे। लेकिन अगर गुरु से नहीं जुड़े, सद्गुरु से नहीं जुडे़ और सिद्धांत से जुड़ गये हो, तो तुम्हारे जीवन में क्या होगा? जो सद्गुरु से नहीं जुड़े हैं, उनके जीवन में क्या हो रहा है? वे किसी न किसी वाद से जुड़ेंगे। वाद का मतलब- सिद्धांत। माओवाद, गांधावाद, लैनिनवाद और बड़े सारे वाद हैं। वहाबी वाद सबसे खतरनाक है। सलाफी वाद और भी खतरनाक है। क्योंकि जब वाद होगा तो विवाद भी होगा। यह हो ही नहीं सकता कि वाद हो और विवाद न हो। वाद, विवाद तक रूक जाए तो कोई दिक्कत नहीं, विवाद हो रहा है, बहस हो रही है। लेकिन जब विवाद होगा तो फसाद भी होगा। फसाद यानि हिंसा।

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“आतंकवाद की जड़ कहां?” – ओशो शैलेन्द्र

स्वयं को परिवार, संस्था, समाज अथवा देश के ठेकेदार समझने वाले व्यक्ति को बारंबार सचेत कराने की जरूरत है कि अगर आपकी बात में दम है तो लोग स्वयं ही मानेंगे। यदि लोग नहीं मान रहे हैं तो मामला स्पष्ट है कि आपके विचार में प्राण नहीं हैं। सदा स्मरण रखें कि गणतंत्र में केवल बहुमत को ही नहीं, अल्पमत को भी जीने का बराबर हक है। बाहरी जगत से साम्राज्यवाद तो लगभग ‘आउट ऑफ डेट’ हो चुका है परंतु मनुष्य जाति के अवचेतन मन में ‘जंगल का कानून’ अभी तक गहरी जड़ें जमाए हुए है- ‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’!

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“ओशो की मुख्य देशना” – ओशो शैलेन्द्र

ओशो से एक बार पूछा गया कि आप रोज सुबह-शाम डेढ़-डेढ़ घंटा प्रवचन देते हैं, हमें समझाते हैं, और पिछले कई सालों से बोल रहे हैं। क्या वह बात अभी तक पूरी नहीं हुई जो आप कहना चाहते हैं?
सदगुरु ने जवाब दिया कि वह बात ही अकथनीय है, वह भाषा में अभिव्यक्त नहीं होती। वह अवर्णनीय है, शब्दों में नहीं समाती। इसलिए मैं कितना ही बोलूं; वह बात कभी पूरी नहीं होगी। वह तो मौन में सुनी जाती है, बोली नहीं जाती। और एक दिन ऐसा आएगा कि जब मेरे शिष्य श्रवण में सक्षम हो जाएंगे, तब वे मेरे संग मौन सत्संग में बैठेंगे। मैं कुछ भी नहीं कहूंगा और तुम सुनोगे। वही असली बात होगी, उसके लिए मैं तुम्हें तैयार कर रहा हूं। थोड़ी रिहर्सल हो जाए चुप रहने की। शांत बैठने की तुम्हारी आदत हो जाए, तब असली बात होगी।
फिर एक दिन आया 25 मार्च 1981, जब ओशो ने घोषणा की, कि…

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“New Year’s Message to Humanity”- OSHO

My message is simple. My message is a new man, homo novus. The old concept of man was of either/or; materialist or spiritualist, moral or immoral, sinner or saint. It was based on division, split. It created a schizophrenic humanity. The whole past of humanity has been sick, unhealthy, insane. In three thousand years, five thousand wars have been fought. This is just utterly mad; it is unbelievable. It is stupid, unintelligent, inhuman.
My concept of the new man is that he will be Zorba the Greek and he will also be Gautam the Buddha: the new man will be Zorba the Buddha. He will be sensuous and spiritual, physical, utterly physical, in the body, in the senses, enjoying the body and all that the body makes possible, and still a great consciousness, a great witnessing will be there. He will be Christ and Epicurus together.

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“Discourse on Birthday/जन्मदिन पर प्रवचन” – OSHO

एक जिसे जन्म कहते हैं, उसे जन्म मत समझ लेना। वह सिर्फ एक सोशल मिथ, एक सामाजिक पुराणकथा है। जिसे मृत्यु कहते हैं, उसे मृत्यु मत समझ लेना, वह केवल हमारे अज्ञान का दूसरा नाम है। जिसे जीवन कहते हैं, उसे जीवन मत समझ लेना, क्योंकि रोज सुबह उठ आना और रोज सांझ सो जाना; रोज वही भोजन, वही कमाना, वही मित्र, वही शत्रु, वही सारा जाल, उसकी निरंतर पुनरुक्ति, अंतहीन पुनरुक्ति…! बड़ी आश्चर्यजनक बात है कि उसकी अंतहीन पुनरुक्ति भी हम करते चले जाते हैं, ऊबते भी नहीं हैं।

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