“नास्तिक ही असली पात्र हैं !” – ओशो

मैं नास्तिकों की ही तलाश में हूँ, वे ही असली पात्र हैं। आस्तिक तो बड़े पाखंडी हो गए हैं। आस्तिक तो बड़े झूठे हो गए हैं। अब आस्तिक में और सच्चा आदमी कहाँ मिलता है? अब वे दिन गए, जब आस्तिक सच्चे हुआ करते थे। अब तो अगर सच्चा आदमी खोजना हो तो नास्तिक में खोजना पड़ता है।
मेरे संन्यास में आस्तिक स्वीकार है, नास्तिक स्वीकार है। आस्तिक को असली आस्तिक बनाते हैं, क्योंकि आस्तिक झूठे हैं। नास्तिक को परम नास्तिकता में ले चलते हैं, क्योंकि परम आस्तिक और परम नास्तिक एक ही हो जाते हैं। कहने-भर का भेद है। आखिरी अवस्था में ‘हाँ’ और ‘न’ में कोई भेद नहीं रह जाता; वे एक ही बात को कहने के दो ढंग हो जाते हैं।

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“Yoga is Beyond Theism, ATheism” – OSHO

Yoga is neither. It is a simple science. It is neither theistic nor atheistic. Patanjali really is superb, a miracle of a man. He never talks about God. And even if he mentions once, then too he says it is just one of the methods to reach the ultimate the belief of God, just a method to reach the ultimate; there is no God. To believe in God is just a technique, because through believing in God prayer becomes possible, through believing in God surrender becomes possible. The significance is of surrender and prayer, not of God.

Patanjali is really unbelievable! He said God — the belief of God, the concept of God — is also one of the methods, in many methods, to reach the truth. Ishwara pranidhan — to believe in God is just a path. But it is not a necessity. You can choose something else. Buddha reaches to that ultimate reality without believing in God. He chooses a different path where God is not needed.

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“नास्तिकता: एक अनिवार्य प्रक्रिया” – ओशो

आस्तिक होने के लिए नास्तिक होना अत्यंत अनिवार्य है। अभागे हैं वे जिन्होंने कभी नास्तिकता नहीं चखी, क्योंकि वे आस्तिकता का स्वाद न समझ पाएंगे। आस्तिकता उभर कर प्रकट होती है, नास्तिकता की पृष्ठभूमि में। जैसे ब्लैकबोर्ड पर लिखते हैं सफेद खडि़या से, अक्षर-अक्षर साफ दिखाई पड़ता है। यूं तो सफेद दीवाल पर भी लिख सकते हैं, मगर तब अक्षर दिखाई न पड़ेंगे।
मेरी अपनी सूझ यही है कि जो नास्तिक होने की हिम्मत रखता है, वही कभी संन्यासी भी हो सकता है। संन्यास नास्तिक होने से भी बड़ी हिम्मत है। जो नास्तिक होने की हिम्मत नहीं रखता इसलिए आस्तिक है, उसकी आस्तिकता दो कौड़ी की है, उसका कोई भी मूल्य नहीं है। कचरा है। जितने जल्दी उससे छुटकारा हो जाए, उतना अच्छा है। जो नास्तिक होने तक की हिम्मत नहीं रखता, वह क्या खाक आस्तिक होगा! आस्तिकता बड़ी बात है। नास्तिकता तो छोटी बात है। ‘नहीं’ तो हमेशा छोटा होता है।

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