“दुख से महासुख की ओर” – ओशो सिद्धार्थ

संसार इस मृगमरिचिका में पड़ा है कि कर्म से सुख मिलता है। लेकिन कर्म से सुख मिलता नहीं। सुख बाहर से मिलने की चीज़ ही नहीं है। ‘सुखस्य दुखस्य नवकोपिदाता, परोददाति इति विमूढ़चेता।’ सुख बाहर से मिलता नहीं। इसीलिए चौथा आर्य सत्य मैं कहना चाहूंगा कि सुख उपाय से नहीं मिलता, क्योंकि सुख बाहर से नहीं मिलता। अगर बाहर से मिलता हो, तो कुछ उपाय किए जा सकते हैं। लेकिन सुख बाहर से मिलता नहीं। इसलिए सुख का कोर्इ उपाय नहीं हो सकता। सुख जीवन की सहज अवस्था है। जिसको ओशो कहते हैं-‘परमात्मा तुम्हारा स्वभाव है।’ सुख तुम्हारा स्वभाव है। ‘आनंद आमार गोत्रा, उत्सव आमार जाति।’ आनंद तुम्हारा बीज है। सुख तुम्हारा बीज है। सुख अभी, यहीं और अकारण है। याद रखना सुख का कोर्इ कारण नहीं है। दुख का कारण है। सुख का कारण नहीं है। दुख का कारण क्या है-कामना।

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“अप्प दीपो भव:” – ओशो

प्रश्न: भगवान बुद्ध ने कहा है: अपने दीए आप बनो। तो क्या सत्य की खोज में किसी भी सहारे की

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