“सृजन:: संन्यास का एक नया आयाम” – ओशो

पुराने दिनों का संन्यास असृजनात्मक हो गया था, इसलिए मुर्दा हो गया था। उसका परमात्मा से संबंध टूट गया था। तुम्हारे पुराने महात्मा क्या सृजन किए हैं? तुम धीरे-धीरे असृजनात्मक क्रियाओं को बड़ा सम्मान देने लगे थे, क्योंकि तुम्हें सृजनात्मकता का बोध ही भूल गया। लोग प्रशंसा करते हैं कि फलां महात्मा बहुत बड़ा है। क्या करता है? क्या किया उसने? क्योंकि वह नग्न है। क्योंकि वह जब सर्दी पड़ती है तो कपड़े नही पहनता। क्योंकि वह धूप में खड़ा होता है। जब लोग छाया तलाशते हैं तब वह धूप में खड़ा होता है। और जब लोग धूप तलाशते हैं तब वह सर्दी में खड़ा होता है। ये विक्षिप्तता के लक्षण हैं। यह आदमी दुखवादी है। यह आदमी रुग्ण है, इसको मानसिक चिकित्सा की जरूरत है।

Read more
%d bloggers like this: