“गुरु पर संदेह और श्रद्धा” – ओशो

जो बात आपकी बुद्धि को उचित मालूम पड़े, आपके विवेक से ताल—मेल खाये, उसे ही स्वीकार करना। जो न ताल—मेल खाये उसे छोड़ देना, फेंक देना।’
गुरु की तलाश में भी यह बात लागू है, लेकिन तलाश के बाद यह बात लागू नहीं है। सब तरह से विवेक की कोशिश करना, सब तरह से बुद्धि का उपयोग करना, सोचना—समझना। लेकिन जब कोई गुरु विवेकपूर्ण रूप से ताल—मेल खा जाये और आपकी बुद्धि कहने लगे कि मिल गयी वह जगह, जहां सब छोड़ा जा सकता है, फिर वहां रुकना मत। फिर छोड़ देना।
लेकिन अगर कोई यह सोचता हो कि एक बार किसी के प्रति शिष्य—भाव लेने पर फिर इंच—इंच अपनी बुद्धि को बीच में लाना ही है, तो उसकी कोई भी गति न हो पायेगी। उसकी हालत वैसी हो जायेगी जैसे छोटे बच्चे आम की गोई को जमीन में गाड़ देते हैं, फिर घड़ी—घड़ी जाकर देखते है कि अभी तक अंकुर फूटा या नहीं। खोदते है, निकालते है। उनकी गोई में कभी भी अंकुर फूटेगा नहीं। फिर जब गोई को गाड़ दिया, तो फिर थोड़ा धैर्य और प्रतीक्षा रखनी होगी। फिर बार—बार उखाड़ कर देखने से कोई भी गति और कोई अंकुरण नहीं होगा।

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