“इंद्रधनुष जैसा है प्रेम !” – ओशो शैलेन्द्र

प्रेम और घृणा के बीच वही नाता है जो जन्म और मृत्यु के बीच में है, जो धूप-छाया के बीच में है। जो दिन और रात के बीच में; अमृत और जहर, ठंडक और गर्मी के बीच में है।
प्रेम एक इंद्रधुनष है, एक पूरी रेंज है। इसको केवल दो टुकड़ों में तोड़ कर ही मत समझो। छोटे-छोटे विभाजन करो तो बात और स्पष्ट हो सकेगी। यदि इंद्रधुनष में हम चुन लें बैंगनी और लाल रंग तो लगता है एक दूसरे के विपरीत हैं। लेकिन जब हम पूरी रेंज को देखें तो सात रंग उसमें छाए हुए हैं, तब हमें पता चलता है कि ये तो एक-दूसरे में परिवर्तनशील हैं। वह बैंगनी ही नीला हो जाता है। बैंगनी और नीले में उतना भेद नहीं है। नीला और पीला के बीच में हरा है। अब बात समझ में आती है कि नीला और पीला रंग जहाँ ओवरलैप कर रहा है वह हरा बन गया। इसी प्रकार और दूसरे भी रंग हैं। पूरी रेंज को समझो तो फिर जो अल्ट्रा-वॅायलेट और इन्फ्रा-रेड है, इन्द्रधनुष के पार के रंग भी एक सीक्वेंस में, एक क्रम में दिखाई देते हैं; और एक-दूसरे में परिवर्तनशील हैं, यह बात भी समझ में आती है। फिर इनके भीतर की विपरीतता खो जाती है, और तारतम्यता प्रगट होती है।

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