“सर्कस में राजनेता” – ओशो

एक राजनेता चुनाव में हार गये। राजनेता थे, और कुछ जानते भी नहीं थे। ने पढ़े-लिखे थे, एक दम से अंगूठा छाप थे। राजनेता होने के लिए अंगूठा छाप होना एक योग्‍यता है। सब तरह से अयोग्‍य होना योग्‍यता है। चुनाव क्‍या हार गए। बड़ी मुश्‍किल में पड़ गये। कोई नौकरी तो मिल नहीं सकती थी, कहीं चपरासी की भी नौकरी नहीं मिली। नेताजी परेशान बाकें हाल, बिना काम के घर में कौन घुसने दे। सब अमचे चमचे भी साथ छोड़ गये।

अचानक नेता का भाग्‍य खुला और सर्कस गांव में आ गया। सो सर्कस के मैनेजर से कहा कि भईया, कोई काम पर लगा दो। अरे घोड़े को नहलाता रहूंगा। गधे को नहलाता रहूंगा, यूं भी जिंदगी घोड़ों और गधों के बीच ही बीती है। कोई भी काम कर सकता हूं। प्रमाण के लिए इतना काफी है कि दस साल तक संसद का सदस्‍य रहा हूं। अब इससे बुरा और क्‍या काम होगा। तुम जो कहो करूंगा; गोबर, लीद,जो भी कहां सब सफाई कर दूँगा।

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