“निंदा में रस क्यों ?” – ओशो

निंदा का बड़ा भाव है। अगर मैं किसी की निंदा करूं, तो आप बिना किसी विवाद के स्वीकार कर लेते हैं। अगर मैं किसी की प्रशंसा करूं, तो आपका मन एकदम चौंक जाता है, आप स्वीकार करने को राजी नहीं होते हैं। आप कहते हैं, सबूत क्या है? प्रमाण क्या है? आप वहम में पड़ गए हैं! लेकिन जब कोई निंदा करता है, तब आप ऐसा नहीं कहते।
कभी आपने देखा कि कोई आ कर जब आपको किसी की निंदा करता है, तो आप कैसे मन से, कैसे भाव से स्वीकार करते हैं? आप यह नहीं पूछते कि यह बात सच है? आप यह नहीं पूछते कि इसका प्रमाण क्या है? आप यह भी नहीं पूछते कि जो आदमी इसकी खबर दे रहा है, वह प्रमाण योग्य है? आप यह भी नहीं पूछते कि इसको मानने का क्या कारण है? क्या प्रयोजन है?

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“आनंद क्या है ?” – ओशो

मनुष्य को तीन प्रकार की अनुभूतियां होती हैं। एक अनुभूति दुख की है; एक अनुभूति सुख की है; एक अनुभूति आनंद की है। सुख की और दुख की अनुभूतियां बाहर से होती हैं। बाहर हम कुछ चाहते हैं, मिल जाए, सुख होता है। बाहर हम कुछ चाहते हैं, न मिले, दुख होता है। बाहर जो जगत है उसके संबंध में हमें दो तरह की अनुभूतियां होती हैं–या तो दुख की, या सुख की।
आनंद की अनुभूति बाहर से नहीं होती। भूल करके आनंद को सुख न समझना। आनंद और सुख में अंतर है। सुख दुख का अभाव है; जहां दुख नहीं है वहां सुख है। दुख सुख का अभाव है; जहां सुख नहीं है वहां दुख है। आनंद दुख और सुख दोनों का अभाव है; जहां दुख और सुख दोनों नहीं हैं, वैसी चित्तकी परिपूर्ण शांत स्थिति आनंद की स्थिति है। आनंद का अर्थ है– जहां बाहर से कोई भी आंदोलन हमें प्रभावित नहीं कर रहा–न दुख का और न सुख का।

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“संतोष क्या है ?” – ओशो

यही संतोष है। अपनी तरफ से मैं अब कुछ भी न करूँगा। तुझसे भिन्न कुछ भी न करूँगा। अगर तेरी मर्जी मुझे गरीब रखने की है, तो गरीब रहूँगा। और तेरी मर्जी अगर मुझे अमीर रखने की है, तो अमीर रहूँगा।
असंतोष का तर्क समझो। असंतोष की व्यवस्था समझो। असंतोष की व्यवस्था यह है कि जो मिल गया, वही व्यर्थ हो जाता है। सार्थकता तभी तक मालूम होती है जब तक मिले नहीं। जिस स्त्री को तुम चाहते थे, जब तक मिले न तब तक बड़ी सुंदर। मिल जाए, सब सौंदर्य तिरोहित। जिस मकान को तुम चाहते थे—कितनी रात सोए नहीं थे! कैसे—कैसे सपने सजाए थे!—फिर मिल गया और बात व्यर्थ हो गयी। जो भी हाथ में आ जाता है, हाथ में आते ही से व्यर्थ हो जाता है। इस असंतोष को तुम दोस्त कहोगे? यही तो तुम्हारा दुश्मन है। यह तुम्हें दौड़ाता है—सिर्फ दौड़ाता है—और जब भी कुछ मिल जाता है, मिलते ही उसे व्यर्थ कर देता है। फिर दौड़ाने लगता है।

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“जीवन में दुःख क्यों है?” – ओशो

दुःख चुनौती है; विकास का अवसर है। दुःख अनिवार्य है। दुःख के बिना तुम जागोगे नहीं। कौन जगाएगा तुम्हें? हालत तो यह है कि दुःख भी नहीं जगा पा रहा है। तुमने दुःख से भी अपने को धीरे-धीरे राजी कर लिए है । अगर दुःख न हो जीवन में, जिंदगी का मजा नहीं मिलता। तो सुख का अनुभव ही नहीं हो सकेगा। काँटों के बिना गुलाब के फूल में कोई रस नहीं है, कोई अर्थ नहीं है। अँधेरी रातों के बिना सुबह की ताजगी नहीं है। और मौत के अंधेरे के बिना जीवन का प्रकाश कहाँ?
मछली को निकाल लो सागर से, छोड़ दो घाट पर, तड़फती है। पहली दफा पता चलता है कि सागर में होने का मजा क्या था। सागर में थी एक क्षण पहले तक, तब तक सागर का कोई पता नहीं था। अब अगर यह सागर में वापस गिरेगी तो अहोभाव होगा; अब यह जानेगी कि सागर का कितना-कितना उपकार है मेरे ऊपर। दूर हुए बिना पास होने का मजा नहीं होता। विरह की अग्नि के बिना मिलन के फूल नहीं खिलते। विरह की लपटों में ही मिलन के फूल खिलते हैं।

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“जीवन एक रहस्य है,पहेली नहीं !” – ओशो

जीवन रहस्य है, मिस्ट्री है। जीवन पहेली नहीं है। पहेली और रहस्य में कुछ फर्क है। पहेली हम उसे कहते हैं जो हल हो सके। रहस्य उसे कहते हैं कि जितना हम हल करेंगे उतना ही हल होना मुश्किल होता जाएगा। पहेली उसे कहते हैं कि जिसकी सुलझ जाने की पूरी संभावना है। क्योंकि पहेली को जान-बूझ कर उलझाया गया है। उलझन बनाई हुई है, निर्मित है। जीवन पहेली नहीं है। उसकी उलझन बनाई हुई नहीं है, निर्मित नहीं है। किसी ने उसे उलझाया नहीं है। सिर्फ सुलझाने वाले ही उलझन में पड़ जाते हैं। जीवन रहस्य है, उसका मतलब यह है कि सुलझाने की कोशिश की तो उलझ जाएगा। और अगर सहज स्वीकार कर लिया तो सब सुलझा हुआ है।

जीवन रहस्य है, उसका अर्थ यह है कि हम कहीं से भी यात्रा करें और कहीं की भी यात्रा करें, अंततः जहां हम पहुंचेंगे वह वही जगह होगी जहां से हमने शुरू किया था। जीवन रहस्य है का अर्थ यह है कि जो प्रारंभ का बिंदु है वही अंत का बिंदु भी है; और जो साधन है वही साध्य भी है; और जो खोज रहा है वही खोजा जाने वाला भी है।

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“ध्यान का रहस्य” – ओशो

ध्यान एक विकसित होने की सतत प्रक्रिया है, कोइ ठहरी हुइ स्थिती या विधी नहीं। विधी सदा ही मृत होती है, इसलिये यह तुममें जोड़ी जा सकती है, किंतु प्रक्रिया सदा जीवंत है। यह विकसित होती है, इसका विस्तार होता है।
ध्यान कोई भारतीय विधि नहीं है और यह केवल एक विधि मात्र भी नहीं है। तुम इसे सीख नहीं सकते। तुम्हारी संपूर्ण जीवन चर्या का, तुम्हारी संपूर्ण जीवन चर्या में यह एक विकास है। ध्यान कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे, जैसे कि तुम हो, उसमें जोड़ा जा सके। यह एक मौलिक रूपांतरण है जो कि तुम्हारे स्वयं के उपर उठने के द्वारा ही आ सकता है। यह एक खिलावट है, यह विकसित होना है। विकास सदा ही पूर्ण होने से होता है, यह कुछ और जोड़ना नहीं है। तुम्हें ध्यान की ओर विकसित होना पड़ेगा।
ध्यान प्रेम की पराकाष्ठा है। किसी एक व्यक्ति के प्रति प्रेम नहीं, वरन समग्र अस्तित्त्व के प्रति जीवंत संबंध है, जो तुम्हें घेरे हुए है। यदि तुम किसी भी परिस्थिति में प्रेममय रह सको तो तुम ध्यान में हो।और यह कोई मन की तरकीब नहीं है। यह कोई मन को स्थिर करने की विधि नहीं है। बल्कि इसके लिए मन की यंत्रवत होने की गहन समझ अनिवार्य है।

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“10 Sutras of Self Revolution” – Osho Shailendra

The guidelines of the revolution are the same. The way in which the revolution took place in my life; similarly it can take place in your life. It can take place in everyone’s life. In short I would like to speak on 10 sutras.
In my life as I was Osho’s younger brother, second, third and fourth step took place by itself. I began directly from the fifth step. Therefore my journey was very simple.

The vision of Master Osho has evolved my heart and beautified my life. It brought joy and bliss to my life. The fiction of the self has broken like a dream. The dust on the mirror of consciousness has been cleaned by His cooling breeze. My dark life has been illuminated by light. A fire of life has ignited a candle in the temple of my heart. Just giving the control of my life in His hands, I didn’t swim nor run in the river of the world but with His grace the boat of my life reached the other shore.

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“Why I Am Here ?” – OSHO

Why are you here? — who can answer it? And if it can be answered, you will no more be a man, you will become a mechanism. This mike is here and there is a reason for it; it can be answered. The car is there in the porch; the why can be answered. If your why also can be answered, you become a mechanism like a mike or a car — you become a utility, a commodity. But you are a man, not a machine.
The answer is possible, but it is not going to come like an answer, it is going to come like a lived experience. The answer is going to be existential, not intellectual. The question is intellectual. Drop it! Rather, be! Otherwise, you can go on asking…. For centuries man has asked millions of questions; not a single question has been solved by speculation, thinking, logic, reason. Not even a single question is solved. On the contrary, whenever people have tried to answer a question, the answer has created a thousand and one more questions.

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“What are Dreams?” – OSHO

Dreaming is one of the greatest subjects. It is still undiscovered, unknown, hidden. It is part of the secret knowledge. But now the moment has come when everything that is secret must be made open. Everything that was hidden up till now must not be hidden any longer or it may prove dangerous.
There are seven types of dreams and seven types of realities. They penetrate one another. Because of this, there is much confusion. But if you make a distinction between the seven, if you become clear about it, it will help much. Psychology is still far away from knowing about dreams. What it knows is only about the physiological, and sometimes the etheric. But the etheric too is interpreted as the physiological.

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“सफल प्रेम भी हैं असफल !” – ओशो

जिनके प्रेम सफल हो गए हैं, उनके प्रेम भी असफल हो जाते हैं। इस संसार में कोई भी चीज सफल हो ही नहीं सकती। बाहर की सभी यात्राएं असफल होने को आबद्ध हैं। क्यों? क्योंकि जिसको तुम तलाश रहे हो बाहर, वह भीतर मौजूद है। इसलिए बाहर तुम्हें दिखाई पड़ता है और जब तुम पास पहुंचते हो, खो जाता है। मृग-मरीचिका है। दूर से दिखाई पड़ता है।
तुम्हारा प्रेम तो शोषण है। पुरुष स्त्री को शोषित करना चाहता है, स्त्री पुरुष को शोषित करना चाहती है। इसीलिए तो स्त्री-पुरुषों के बीच सतत झगड़ा बना रहता है। पति-पत्नी लड़ते रहते हैं। उनके बीच एक कलह का शाश्वत वातावरण रहता है। कारण है क्योंकि दोनों एक-दूसरे को कितना शोषण कर लें, इसकी आकांक्षा है। कितना कम देना पड़े और कितना ज्यादा मिल जाए इसकी चेष्टा है। यह संबंध बाजार का है, व्यवसाय का है।

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“निषेध में निमंत्रण है, आकर्षण है” – ओशो

सब निषेध चोरी को बढ़ाते हैं। क्योंकि जितना तुम कहते हो कि मत करो! उतना लोगों के अहंकार को चोट लगती है; वे करने को तत्पर हो जाते हैं। वे यह भी भूल जाते हैं कि क्या जरूरी था, क्या गैर-जरूरी था। ऐसे ही जैसे इस दरवाजे पर हम एक तख्ती लगा दें कि भीतर झांकना मना है। फिर तुम बिना झांके निकल सकोगे? तख्ती पढ़ना न आता हो तो बात और, लेकिन तख्ती लगी है कि झांकना मना है तो तुम बिना झांके नहीं निकल सकते। क्योंकि तख्ती खबर देती है कि कुछ झांकने योग्य भीतर होना ही चाहिए। कोई सुंदरी बैठी हो। कुछ न कुछ मामला है, नहीं तो तख्ती क्यों है? तुम झांकोगे।

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“लोग नशे के आदी क्यों हो जाते हैं?” – डॉ. ओशो शैलेन्द्र

आदत कोई भी हो, उसकी जो बुनियाद है, वह है- एक प्रकार की मूर्च्छा, प्रमाद। व्यक्ति एक प्रकार की बेहोशी में होता है और वही-वही किये चला जाता है। वह आदत कब और कैसे शुरु हुई, इसका ख्याल भी नहीं रहता। अगर यही बात ख्याल में आ जाए तो वह आदत छूटनी शुरु हो सकती है। किसी भी प्रकार के नशे से मुक्त होने के लिए यह गौर करना ज़रूरी है कि आपके जीवन में ऐसी कौन सी आदत है जो आपके व्यक्तित्व, शरीर या मन को नुकसान पहुंचा रही है। संभव है, वह कहीं दूर, बचपन की कोई चीज हो, जिसे आप भूल भी चुके हों। इसलिए, यहां यह समझना उपयोगी होगा कि आदतें शुरु कैसे होती हैं।

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जीवन का सूत्र – “बिल्‍ली मत पालना” !!

एक बार एक महात्मा मरने के करीब था। उसने अपने प्रिय शिष्य को अपने पास बुलाया और कहने लगा। देख तू मेरी एक बात मान जो चाहे करना पर बिल्‍ली मत पालना। ये में अपने जीवन भी निचोड़ तुझे दिये जा रहा हूं। ये तेरी जीवन का सूत्र है।

शिष्‍य ने कहा पर गुरूदेव में इस सूत्र का अर्थ समझ नहीं पाया। पर गुरु के पास समय कम था सो वह स्‍वर्ग सीधार गये। अब युवक उस सूत्र में उलझा रह गया। कितने शास्त्र पढ़े पर उसका हल नहीं मिला। अब गुरु की बात को झूठ तो मान नहीं सकता। उपनिषद, पुराण, सभी धार्मिक ग्रंथों में टटोल लिया पर उस गूढ सूत्र का रहस्‍य नहीं मिला तो नहीं मिला। पर शिष्‍य की समझ में ये नहीं आ रहा था की बिल्‍ली का अध्‍यात्‍म से क्‍या रहस्‍य हो सकता है।

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“जो होता है, ठीक ही होता है !” – ओशो

आपके लिए सभी कुछ ठीक नहीं हो सकता। आपके लिए वही ठीक होगा, जिससे सुख मिले; और वह गलत होगा, जिससे दुख मिले। जब तक आपको दुख मिल सकता है, तब तक सभी कुछ ठीक नहीं हो सकता। जब तक आप दुखी हो सकते हैं, तब तक सभी कैसे ठीक होगा?

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“अन्नं ब्रह्म (Food is God) !” – ओशो

अन्नं ब्रह्म! – हिंदुओं ने अन्न को ब्रह्म कहा है। जिन्होंने अन्न को ब्रह्म कहा है उन्होंने जरूर स्वाद लिया होगा। जिन्होंने लिखा है, उन्होंने खूब भोगकर लिखा होगा, खूब अन्न को परखकर लिखा होगा।

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“संबोधि क्या है? संबोधि दिवस पर आपका संदेश क्या है?” – ओशो

संबोधि का अर्थ होता है –तुम्हारे भीतर की आंख। और कुछ ज्यादा कठिनाई की बात नहीं है; थोड़ी सी धूल पड़ी है–सपनों की धूल। धूल भी सच नहीं। विचारों की धूल। कल्पनाओं की धूल।

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