“प्रेम दगाबाज़ है ! ” – ओशो

किसी ने धोखा नहीं दिया है। जिस दिन तुम्हारा और तुम्हारी प्रेयसी के बीच प्रेम चुक जाएगा, उस दिन तुम यह मत सोचना कि प्रेयसी ने धोखा दिया है; यह मत सोचना कि प्रेमी दगाबाज निकला। नहीं, प्रेम दगाबाज है। न तो प्रेयसी दगाबाज है, न प्रेमी दगाबाज है—प्रेम दगाबाज है।

जिसे तुमने प्रेम जाना था वह क्षणभंगुर था, पानी का बबूला था।

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“सफल प्रेम भी हैं असफल !” – ओशो

जिनके प्रेम सफल हो गए हैं, उनके प्रेम भी असफल हो जाते हैं। इस संसार में कोई भी चीज सफल हो ही नहीं सकती। बाहर की सभी यात्राएं असफल होने को आबद्ध हैं। क्यों? क्योंकि जिसको तुम तलाश रहे हो बाहर, वह भीतर मौजूद है। इसलिए बाहर तुम्हें दिखाई पड़ता है और जब तुम पास पहुंचते हो, खो जाता है। मृग-मरीचिका है। दूर से दिखाई पड़ता है।
तुम्हारा प्रेम तो शोषण है। पुरुष स्त्री को शोषित करना चाहता है, स्त्री पुरुष को शोषित करना चाहती है। इसीलिए तो स्त्री-पुरुषों के बीच सतत झगड़ा बना रहता है। पति-पत्नी लड़ते रहते हैं। उनके बीच एक कलह का शाश्वत वातावरण रहता है। कारण है क्योंकि दोनों एक-दूसरे को कितना शोषण कर लें, इसकी आकांक्षा है। कितना कम देना पड़े और कितना ज्यादा मिल जाए इसकी चेष्टा है। यह संबंध बाजार का है, व्यवसाय का है।

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“प्रेम, संबंध नहीं है ! ” – ओशो

प्रेम की अभीप्सा असफल हो जाती हो तो जीवन व्यर्थ दिखायी पड़ने लगे–अर्थहीन, मीनिंगलेस, फस्ट्रेशन मालूम पड़े, विफलता मालूम पड़े, चिंता मालूम पड़े तो कोई आश्चर्य नहीं है। जीवन की केंद्रीय प्यास ही सफल नहीं हो पाती है! न तो हम प्रेम दे पाते हैं और न उपलब्ध कर पाते हैं। और प्रेम जब असफल रह जाता है, प्रेम का बीज जब अंकुरित नहीं हो पाता, तो सारा जीवन व्यर्थ-व्यर्थ, असार-असार मालूम होने लगता है।
जीवन भर प्रयास करते हैं? सारे प्रयास प्रेम के आसपास ही होते हैं। युद्ध प्रेम के आसपास लड़े जाते हैं। धन प्रेम के आसपास इकट्ठा किया जाता है। यश की सीढ़ियां प्रेम के लिए पार की जाती हैं। संन्यास प्रेम के लिए लिया जाता है। घर-द्वार प्रेम के लिए बसाये जाते हैं और प्रेम के लिए छोड़े जाते हैं। जीवन का समस्त क्रम प्रेम की गंगोत्री से निकलता है।
लेकिन यह प्रेम है क्या? यह प्रेम की अभीप्सा क्या है? यह प्रेम की पागल प्यास क्या है? कौन-सी बात है, जो प्रेम के नाम से हम चाहते हैं और नहीं उपलब्ध कर पाते हैं?

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“Men and Women : Polar Opposites” – OSHO

There is a difference between the male mind and the female mind; their functioning is different. They are polar opposites — never forget that. Spiritually they are exactly the same, but physiologically they are poles apart; they function in different ways.

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“प्रेम मांग नहीं हैं !!! ” – ओशो

प्रेम की मांग कभी मत करो, प्रेम अपने आप आएगा। तुम प्रेम दोगे, वह आएगा…और आएगा। वह देने से बढ़ता

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“प्रेम पर भरोसा करो !” – ओशो

एक बड़ी प्राचीन कथा है। एक सम्राट अपने वजीर पर नाराज हो गया। उसने उसे एक मीनार पर बंद करवा

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“प्रेम: समर्पण है, ईर्ष्या और शोषण नहीं” – ओशो

“प्रेम तो समर्पण है, मालकियत नहीं “ प्रेम में ईर्ष्या हो तो प्रेम ही नहीं है, फिर प्रेम के नाम

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“स्त्री पहली बार हो रही है चरित्रवान” – ओशो

“स्त्री पहली बार हो रही है चरित्रवान”  –  ओशो तुम्हारे चरित्र का एक ही अर्थ होता है बस कि स्त्री

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“बच्चों में डर क्यों?” – ओशो

“बच्चों के मन में डर क्यों?” – ओशो छुटपन से ही छोटे-छोटे बच्चे भी डर जाते हैं। बच्चे की समझ

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“Friendship Is Higher Than Love” – OSHO

Friendship has a higher quality than love. The next step of love is friendship. Not that it is lower, as it is understood ordinarily; it is not.
In love there is passion, lust; love is more rooted in the physical. Friendship is purer, not rooted in the sexual at all. Friendship is between two beings: it is asexual and transcendental to the physical.
Friendship has a coolness in it. Love has heat, hence it goes high, low; sometimes everything is beautiful and sometimes everything is ugly. Love changes. Friendship has a more eternal quality to it; it doesn’t change.

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“प्रेम ही परमात्मा है” – ओशो

प्रेम ही परमात्मा है | प्रेम शब्द से न चिढ़ो। यह हो सकता है कि तुमने जो प्रेम समझा था

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