“माया क्या है ?” – ओशो

एक स्त्री के तुम प्रेम में पड़ गए। फिर विवाह का संयोजन किया। चला, जादू शुरू हुआ! विवाह का आयोजन जादू की शुरुआत है। अब एक भ्रांति पैदा करनी है। यह स्त्री तुम्हारी नहीं है, यह तुम्हें पता है अभी। अब एक भ्रांति पैदा करनी है कि मेरी है, तो बैंड – बाजे बजाए, बारात चली, घोड़े पर तुम्हें दुल्हा बना कर बिठाया। अब ऐसे कोई घोड़े पर बैठता भी नहीं। अब तो सिर्फ दुल्हा जब बनते हैं, तभी घोड़े पर बैठते हैं। छुरी इत्यादि लटका दी। चाहे छुरी निकालना भी न आता हो, चाहे छुरी से साग-सब्जी भी न कट सकती हो; मगर छुरी लटका दी। मोर-मुकुट बांध दिए। बड़े बैंड—बाजे, बड़ा शोरगुल – चली बारात! यह भ्रांति पैदा करने का उपाय है। यह एक मनोवैज्ञानिक उपाय है। तुम्हें यह विश्वास दिलाया जा रहा है: कोई बड़ी महत्वपूर्ण घटना घट रही है! भारी घटना घट रही है! अब तुम इस भ्रांति में पड़ गए हो कि तुम पति हो गए हो और तुमने यह मान लिया है कि यह मेरी पत्नी हो गई है। अब तुम इस भ्रांति में जियोगे।
एक भ्रांति से दूसरी भ्रांति, तीसरी भ्रांति हम खड़ी करते चले जाते हैं। हम एक महल खड़ा कर देते हैं भ्रांतियों का। इस भ्रांति का नाम माया है।

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