“पशु हो जाएं !” – ओशो

परमगुरु ओशो द्वारा दी गई, ध्यान में प्रवेश की सहज विधि – ‘पशु हो जाएं’ !

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“शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण” – ओशो

देह शूद्र है। मन वैश्य है। आत्मा क्षत्रिय है। परमात्मा ब्राह्मण। इसलिए ब्रह्म परमात्मा का नाम है। ब्रह्म से ही ब्राह्मण बना है।

देह शूद्र है। क्यों? क्योंकि देह में कुछ और है भी नहीं। देह की दौड़ कितनी है? खा लो, पी लो, भोग कर लो, सो जाओ। जीओ और मर जाओ। देह की दौड़ कितनी है! शूद्र की सीमा है यही। जो देह में जीता है, वह शूद्र है। शूद्र का अर्थ हुआ. देह के साथ तादात्म्य। मैं देह हूं? ऐसी भावदशा – शूद्र।

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“साक्षी है ध्यान की आत्मा ! ” – ओशो

ध्यान का अर्थ है होश। तुम जो कुछ भी होशपूर्वक करते हो वह ध्यान है। कर्म क्या है, यह प्रश्न नहीं, किन्तु गुणवत्ता जो तुम कर्म में ले आते हो, उसकी बात है। चलना ध्यान हो सकता है, यदि तुम होशपूर्वक चलो। बैठना ध्यान हो सकता है, यदि तुम होशपूर्वक बैठ सको। पक्षियों की चहचहाहट को सुनना ध्यान हो सकता है, यदि तुम होशपूर्वक सुन सको। या केवल अपने भीतर मन की आवाजों को सुनना ध्यान बन सकता है, यदि तुम जाग्रत और साक्षी रह सको। सारी बात यह है कि तुम सोये-सोये मत रहो। फिर जो भी हो, ध्यान होगा।

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“ध्यान का रहस्य” – ओशो

ध्यान एक विकसित होने की सतत प्रक्रिया है, कोइ ठहरी हुइ स्थिती या विधी नहीं। विधी सदा ही मृत होती है, इसलिये यह तुममें जोड़ी जा सकती है, किंतु प्रक्रिया सदा जीवंत है। यह विकसित होती है, इसका विस्तार होता है।
ध्यान कोई भारतीय विधि नहीं है और यह केवल एक विधि मात्र भी नहीं है। तुम इसे सीख नहीं सकते। तुम्हारी संपूर्ण जीवन चर्या का, तुम्हारी संपूर्ण जीवन चर्या में यह एक विकास है। ध्यान कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे, जैसे कि तुम हो, उसमें जोड़ा जा सके। यह एक मौलिक रूपांतरण है जो कि तुम्हारे स्वयं के उपर उठने के द्वारा ही आ सकता है। यह एक खिलावट है, यह विकसित होना है। विकास सदा ही पूर्ण होने से होता है, यह कुछ और जोड़ना नहीं है। तुम्हें ध्यान की ओर विकसित होना पड़ेगा।
ध्यान प्रेम की पराकाष्ठा है। किसी एक व्यक्ति के प्रति प्रेम नहीं, वरन समग्र अस्तित्त्व के प्रति जीवंत संबंध है, जो तुम्हें घेरे हुए है। यदि तुम किसी भी परिस्थिति में प्रेममय रह सको तो तुम ध्यान में हो।और यह कोई मन की तरकीब नहीं है। यह कोई मन को स्थिर करने की विधि नहीं है। बल्कि इसके लिए मन की यंत्रवत होने की गहन समझ अनिवार्य है।

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“What is Meditation ? ” – OSHO

Meditation is not an Indian method; it is not simply a technique. You cannot learn it. It is a growth: a growth of your total living, out of your total living. Meditation is not something that can be added to you as you are. It can come to you only through a basic transformation, a mutation. It is a flowering, a growth. Growth is always out of the total; it is not an addition. You must grow toward meditation.
Meditation is the culmination of love: love not for a single person, but for the total existence. To me, meditation is a living relationship with the total existence that surrounds you. If you can be in love with any situation, then you are in meditation.

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“ध्यान क्या है?” – ओशो

ध्यान है पर्दा हटाने की कला। और यह पर्दा बाहर नहीं है, यह पर्दा तुम्हारे भीतर पड़ा है, तुम्हारे अंतस्तल पर पड़ा है। ध्यान है पर्दा हटाना। पर्दा बुना है विचारों से। विचार के ताने-बानों से पर्दा बुना है। अच्छे विचार, बुरे विचार, इनके ताने-बाने से पर्दा बुना है। जैसे तुम विचारों के पार झांकने लगो, या विचारों को ठहराने में सफल हो जाओ, या विचारों को हटाने में सफल हो जाओ, वैसे ही ध्यान घट जाएगा। निर्विचार दशा का नाम ध्यान है। ध्यान का अर्थ है, ऐसी कोई संधि भीतर जब तुम तो हो, जगत तो है और दोनों के बीच में विचार का पर्दा नहीं है।

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“विचार क्या है? विचारों से कैसे बचें?” – ओशो

सब विचार बाहर के संबंध में चल रहे हैं। चौबीस घंटे बाहर के लिए सोच रहे हैं। बाहर को सोच

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“ध्यान किसलिए करें?” – ओशो

ठीक पूछा है। क्योंकि हम तो हर बात के लिए पूछेंगे कि किसलिए? कोई कारण हो पाने के लिए तो

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“साक्षी क्या है?” – ओशो

मैं शरीर नहीं हूं, ऐसा किसको अनुभव होता है? मैं मन नहीं हूं, ऐसा किसको अनुभव होता है? ऐसा कौन इनकार करता चला जाता है कि मैं यह नहीं हूं, मैं यह नहीं हूं, मैं यह नहीं हूं?
एक तत्व है हमारे भीतर दर्शन का, दृष्टि का, द्रष्टा का, देखने का। हम देख रहे हैं; हम जांच रहे हैं। वह जो देख रहा है, वही है साक्षी; जो दिखाई पड़ रहा है, वही है जगत।
मैंने बोला; यह एक बिंदु हुआ। साधारणतः आपका ध्यान इसी पर लगा रहता है। आपने सुना भी, आप सुनने वाले हैं, ऐसी भी आपको प्रतीति हुई, एहसास हुआ, अनुभव हुआ; यह दूसरा बिंदु हो गया। यह दूसरा बिंदु पाना बहुत कठिन है। अगर यह दूसरा बिंदु आपको मिल जाए तो तीसरा बिंदु पाना बहुत सरल है। वह तीसरा बिंदु यह है कि बोलने वाला है ‘अ’, सुनने वाला है ‘ब’, फिर आप कौन हैं भीतर जो कि दोनों को अनुभव कर रहे हैं – बोलने वाले को भी और सुनने वाले को भी! आप तीसरे हो गए, दि थर्ड प्वाइंट। वह जो तीसरा बिंदु है, वही साक्षी है। इस तीसरे के पार नहीं जाया जा सकता। यह तीसरा आखिरी बिंदु है। और यह है त्रिकोण जीवन का। दो बिंदु: विषय और विषयी। और तीसरा बिंदु: दोनों का साक्षी; दोनों को अनुभव करने वाला; दोनों को भी देख लेने वाला; दोनों का भी गवाह।

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“रात्रि ध्यान” – ओशो

यह विधि बहुत-बहुत बुनियादी है। इसे बहुत प्रयोग में लाया गया—विशेषकर बुद्ध के द्वारा। और इस विधि के अनेक प्रकार

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“प्रार्थना ध्‍यान” – ओशो

अच्‍छा हो कि यह प्रार्थना ध्‍यान आप रात में करो। कमरे में अंधकार कर ले। और ध्‍यान खत्‍म होने के

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संतुलन ध्यान – ओशो

लाओत्से के साधना-सूत्रों में एक गुप्त सूत्र आपको कहता हूं, जो उसकी किताबों में उलेखित नहीं है, लेकिन कानों-कान लाओत्से की परंपरा में चलता रहा है। वह सूत्र है लाओत्से की ध्यान की पद्धति का। वह सूत्र यह है।

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“संतुलन ध्‍यान – बैलेंसिंग” – ओशो

तिब्‍बत में एक बहुत छोटी सी विधि है—बैलेंसिंग, संतुलन उस विधि का नाम है। कभी घर में खड़े हो जाएं

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