“एक ओंकार सतनाम” – ओशो

“इक ओंकार सतिनाम, करता पुरखु निरभऊ। निरबैर, अकाल मूरति, अजूनी, सैभं गुर प्रसादि!! जप आद सचु जुगादि सच। है भी

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