“विज्ञान: विश्वास से विवेक की ओर” – ओशो

हमारी चेतना में हो रही इस सारी उथल-पुथल, अराजकता, क्रांति और नए के जन्म की संभावना का केंद्र और आधार विज्ञान है। विज्ञान के आलोक ने हमारी आंखें खोल दी हैं और हमारी नींद तोड़ दी है। उसने ही हमसे हमारे बहुत-से दीर्घ पोषित स्वप्न छीन लिए हैं और बहुत से वस्त्र भी और हमारे स्वयं के समक्ष ही नग्न खड़ा कर दिया है, जैसे किसी ने हमें झकझोर कर अर्धरात्रि में जगा दिया हो। ऐसे ही विज्ञान ने हमें जगा दिया है।
विज्ञान ने मनुष्य का बचपन छीन लिया है और उसे प्रौढ़ता दे दी है। उसकी ही खोजों और निष्पत्तियों ने हमें हमारी परंपरागत और रूढ़िबद्ध चिंतना से मुक्त कर दिया है, जो वस्तुतः चिंतना नहीं, मात्र चिंतन का मिथ्या आभास ही थी; क्योंकि जो विचार स्वतंत्र न हो वह विचार ही नहीं होता है। सदियों-सदियों से जो अंधविश्वास मकड़ी के जालों की भांति हमें घेरे हुए थे, उसने उन्हें तोड़ दिया है, और यह संभव हो सका है कि मनुष्य का मन विश्वास की कारा से मुक्त होकर विवेक की ओर अग्रसर हो सके।
कल तक के इतिहास को हम विश्वास-काल कह सकते हैं। आनेवाला समय विवेक का होगा।

Read more

“भगवान नहीं: भगवत्ता; धर्म नहीं: धार्मिकता” – ओशो

प्रश्नः इधर आप भगवान की जगह भगवत्ता और धर्म की जगह धार्मिकता की बात कर रहे हैं। हमें भगवत्ता और धार्मिकता को विस्तृत रूप से समझाने की कृपा करें।

भगवत्ता एक सत्य है; भगवान एक कल्पना। भगवत्ता एक अनुभव है; भगवान, एक प्रतीक, एक प्रतिमा। जैसे तुमने भारत माता की तस्वीरें देखी हों। कोई चाहे तो प्रेम की तस्वीर बना ले। लोगों ने प्रभात की तस्वीरें बनाई हैं, रात्रि की तस्वीरें बनाई हैं। प्रकृति को भी रूपायित करने की चेष्टा की है। काव्य की तरह वह सब ठीक, लेकिन सत्य की तरह उसका कोई मूल्य नहीं।
जीवन, अस्तित्व संज्ञाओं से नहीं बनता, क्रियाओं से बनता है। और हमारी भाषा संज्ञाओं पर जोर देती है। जैसे सच पूछो तो जब हम कहते हैं वृक्ष है, तो गलत कहते हैं। कहना चाहिए–वृक्ष हो रहा है। वृक्ष एक क्रिया है, जीवंतता है। वृक्ष कोई ऐसी चीज नहीं जो ठहरी है; गतिमान है, गत्यात्मक है, प्रवाहमान है। वृक्ष की तो छोड़ ही दो, हम तो यह भी कहते हैं कि नदी है।

Read more

“नास्तिक ही असली पात्र हैं !” – ओशो

मैं नास्तिकों की ही तलाश में हूँ, वे ही असली पात्र हैं। आस्तिक तो बड़े पाखंडी हो गए हैं। आस्तिक तो बड़े झूठे हो गए हैं। अब आस्तिक में और सच्चा आदमी कहाँ मिलता है? अब वे दिन गए, जब आस्तिक सच्चे हुआ करते थे। अब तो अगर सच्चा आदमी खोजना हो तो नास्तिक में खोजना पड़ता है।
मेरे संन्यास में आस्तिक स्वीकार है, नास्तिक स्वीकार है। आस्तिक को असली आस्तिक बनाते हैं, क्योंकि आस्तिक झूठे हैं। नास्तिक को परम नास्तिकता में ले चलते हैं, क्योंकि परम आस्तिक और परम नास्तिक एक ही हो जाते हैं। कहने-भर का भेद है। आखिरी अवस्था में ‘हाँ’ और ‘न’ में कोई भेद नहीं रह जाता; वे एक ही बात को कहने के दो ढंग हो जाते हैं।

Read more

“Sufism: A Rebel against Islam?” – OSHO

Sufism is pre-Islam and yet it is a unique new phenomenon too. It is the essential core of Islam and yet it is a rebellion against the establishment of Islam too. That’s how it is always. Zen is also both — it is the essential core of Buddhism and a rebellion against the establishment.
Yes, it is very rebellious. It is rebellious because it is essential. The essential is always rebellious. Mohammed was a rebellious man — his whole life he was haunted by enemies. Many times he was just on the brink of being killed. He had to fight his whole life — a mystic had to become a warrior, a mystic had to waste his whole life in being a warrior. He had to carry a sword. And you can see the contradiction, the paradox — on his sword he had written the words: peace, love. Love had to carry a sword because of mad people. Peace had to carry a sword because of neurosis.

Read more

“परमात्मा का प्रमाण” – ओशो

प्रश्न- आप कहते हैं संसार में ही परमात्मा छिपा है। इसका प्रमाण क्या है? संसार में परमात्मा छिपा है, ऐसा

Read more

“धर्म से धार्मिकता की ओर” – ओशो सिद्धार्थ

पहले तो यह समझें कि धर्म क्या है और धार्मिकता क्या है? धर्म के दो आयाम हैं- एक कट्टरता और दूसरा धार्मिकता। कट्टरता – जहाँ धर्म रुक जाता है। धार्मिकता – जहाँ धर्म प्रवाहित रहता है। कट्टरता कर्मकाण्ड में ले जाती है। धार्मिकता जीवन्तता में ले जाती है।

धर्म या तो आगे बढ़ेगा या पीछे जायेगा। अगर धर्म जीवन्त नहीं हो तो कट्टरता उसकी नियति है। तो पहली बात कि धर्म अपने आप में, स्वतन्त्र रूप में व्याख्येय नहीं है। धर्म का कौन-सा स्वरूप धार्मिकता का स्वरूप है, और कौन-सा रूप कट्टरता का स्वरूप है? जब भी कोई बुद्ध पुरुष आता है, जब भी कोई सद्गुरु आता है, जब भी कोई पूरा गुरु होता है, उस धर्म में तो धार्मिकता पैदा होती है और जब वह विदा हो जाता है, तो उसके पीछे एक राख रह जाती है और कट्टरता से कर्मकाण्ड का जन्म होता है।

Read more

“धर्म को मारता कौन है?” – ओशो

पहले समझें कि धर्म को जिलाता कौन है? क्योंकि अगर हम जिलाने वाले को पहचान लें, तो मारनेवाले को भी

Read more
%d bloggers like this:
Sign up for OshoDhara Updates

Enter your email and Subscribe.

Subscribe!