“संतोष क्या है ?” – ओशो

यही संतोष है। अपनी तरफ से मैं अब कुछ भी न करूँगा। तुझसे भिन्न कुछ भी न करूँगा। अगर तेरी मर्जी मुझे गरीब रखने की है, तो गरीब रहूँगा। और तेरी मर्जी अगर मुझे अमीर रखने की है, तो अमीर रहूँगा।
असंतोष का तर्क समझो। असंतोष की व्यवस्था समझो। असंतोष की व्यवस्था यह है कि जो मिल गया, वही व्यर्थ हो जाता है। सार्थकता तभी तक मालूम होती है जब तक मिले नहीं। जिस स्त्री को तुम चाहते थे, जब तक मिले न तब तक बड़ी सुंदर। मिल जाए, सब सौंदर्य तिरोहित। जिस मकान को तुम चाहते थे—कितनी रात सोए नहीं थे! कैसे—कैसे सपने सजाए थे!—फिर मिल गया और बात व्यर्थ हो गयी। जो भी हाथ में आ जाता है, हाथ में आते ही से व्यर्थ हो जाता है। इस असंतोष को तुम दोस्त कहोगे? यही तो तुम्हारा दुश्मन है। यह तुम्हें दौड़ाता है—सिर्फ दौड़ाता है—और जब भी कुछ मिल जाता है, मिलते ही उसे व्यर्थ कर देता है। फिर दौड़ाने लगता है।

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“What is Meditation ? ” – OSHO

Meditation is not an Indian method; it is not simply a technique. You cannot learn it. It is a growth: a growth of your total living, out of your total living. Meditation is not something that can be added to you as you are. It can come to you only through a basic transformation, a mutation. It is a flowering, a growth. Growth is always out of the total; it is not an addition. You must grow toward meditation.
Meditation is the culmination of love: love not for a single person, but for the total existence. To me, meditation is a living relationship with the total existence that surrounds you. If you can be in love with any situation, then you are in meditation.

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“संन्यास सिर्फ शुरुआत है” – ओशो

संन्यास सिर्फ शुरुआत है – भक्ति की नहीं – संन्यास शुरुआत है परमात्मा की तरफ जाने की। तुमने संकल्प किया कि अब जाता हूं, यात्राा पर निकलूंगा, तुमने पाथेय तैयार कर लिया, तुमने अपना बोरिया-बिस्तर बांध लिया, तुम आकर गांव के द्वार पर खड़े हो गए। संन्यास महाप्रस्थान है, सिर्फ शुरुआत है। न भक्ति की न ज्ञान की, न कर्म की। फिर तीन मार्ग हो जाते हैं। कोर्इ ज्ञान पर जाएगा, कोर्इ भक्ति पर, कोर्इ कर्म पर। संन्यास तो सिर्फ जाने की तैयारी है। संन्यास तो इस बात की घोषणा है कि मैं जाने को तैयार हूं। इसके बाद मार्ग अलग हो जाएंगे।

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“Guru – Disciple Relationship” – OSHO

Guru is not a teacher; a guru is a person who has attained to a religious mode of living. Religion is not information, it cannot be taught because religion is a way of living. The very presence of the guru is a communion. And to one living in contact with him, something is communicated — though not through words. The relationship is so intimate that it is less like teacher and pupil and more like lover and beloved.
The guru must himself be enlightened, he must himself have attained, because one cannot communicate that which one has not realized. Religious experience can be communicated only when it is firsthand. A teacher need not be self-realized, but a guru must be. A teacher can give secondhand information from scriptures or traditions, but a guru cannot. A guru is a person who has realized truth.

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“अहंकार त्याग:: गौतम बुद्ध और यशोधरा” – ओशो

गौतम बुद्ध ज्ञान को उपलब्ध होने के बाद घर वापस लौटे। बारह साल बाद वापस लौटे। जिस दिन घर छोड़ा

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“सृजन:: संन्यास का एक नया आयाम” – ओशो

पुराने दिनों का संन्यास असृजनात्मक हो गया था, इसलिए मुर्दा हो गया था। उसका परमात्मा से संबंध टूट गया था। तुम्हारे पुराने महात्मा क्या सृजन किए हैं? तुम धीरे-धीरे असृजनात्मक क्रियाओं को बड़ा सम्मान देने लगे थे, क्योंकि तुम्हें सृजनात्मकता का बोध ही भूल गया। लोग प्रशंसा करते हैं कि फलां महात्मा बहुत बड़ा है। क्या करता है? क्या किया उसने? क्योंकि वह नग्न है। क्योंकि वह जब सर्दी पड़ती है तो कपड़े नही पहनता। क्योंकि वह धूप में खड़ा होता है। जब लोग छाया तलाशते हैं तब वह धूप में खड़ा होता है। और जब लोग धूप तलाशते हैं तब वह सर्दी में खड़ा होता है। ये विक्षिप्तता के लक्षण हैं। यह आदमी दुखवादी है। यह आदमी रुग्ण है, इसको मानसिक चिकित्सा की जरूरत है।

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“संन्यास क्या है ?” – ओशो

संन्यास का अर्थ है : खुली हुई मुट्ठीवाला जीवन, जहां हम कुछ भी बांधना नहीं चाहते, जहां जीवन एक प्रवाह है और सतत नये की स्वीकृति और कल जो दिखाएगा उसके लिए भी परमात्मा को धन्यवाद का भाव। बीते हुए कल को भूल जाना है, क्योंकि बीता हुआ कल अब स्मृति के अतिरिक्त और कहीं नहीं है। जो हाथ में है, उसे भी छोड़ने की तैयारी रखनी है, क्योंकि इस जीवन में सब कुछ क्षणभंगुर है। जो अभी हाथ में है, क्षणभर बाद हाथ के बाहर हो जाएगा। जो सांस अभी भीतर है, क्षणभर बाद बाहर होगी। ऐसा प्रवाह है जीवन। इसमें जिसने भी रोकने की कोशिश की, वह वही गृहस्थ है और जिसने जीवन के प्रवाह में बहने की सामर्थ्य साध ली, जो प्रवाह के साथ बहने लगा —सरलता से, सहजता से, असुरक्षा में, अनजान में, अज्ञान में—वही संन्यासी है।

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“बिना संन्यास के शिष्यत्व संभव नहीं !” – ओशो

जिज्ञासा व्यक्ति को विद्यार्थी बनाती है। विद्यार्थी का मतलब यह है, मैं अपने को बदलने को राजी नहीं हूं, लेकिन हां, कुछ ज्ञान की बातें अगर मिल जाएं तो जरूर संगृहीत कर लूंगा, संजो कर रख लूंगा अपनी मंजूषा में। वक्त पड़े शायद काम आएं। और अपने काम न आयीं तो कोई हर्ज नहीं, दूसरों को सलाह देने के काम आएंगी। इस तरह पंडित पैदा होता है। पंडित विद्यार्थी का चरम निष्कर्ष है।

मुमुक्षा का अर्थ हैः जानकारी से क्या करूंगा? जीवन चाहिए! अनुभव चाहिए! नहीं जानना चाहता हूं परमात्मा के संबंध में, परमात्मा को ही पीना चाहता हूं। बिना पीये यह नहीं हो सकता है। और पीने के लिए, नदी बह रही हो और तुम प्यासे अगर खड़े रहो तट पर तो भी प्यास नहीं बुझेगी। तुम नदी के तट पर खड़े होकर सोच-विचार करते रहो कि पानी कैसे बनता है, इसका रासायनिक पफार्मूला क्या है “H2O” तो भी प्यास नहीं बुझेगी। तुम्हें नदी में उतरना पड़ेगा। उत्तर जानने से भी प्यास नहीं बुझेगी, तुम्हें दोनों हाथों को बांधकर अंजुली बनानी होगी। अंजुली बना लेने से भी प्यास नहीं बुझेगी, तुम्हें पिफर झुकना होगा ताकि तुम अपनी अंजुली में नदी के जल को भर सको। बिना झुके तुम अंजुली को भर न पाओगे। और झुकोगे तो पी सकोगे। और पीओगे तो तृप्ति है।
संन्यास का कुछ और अर्थ नहीं है। झुकना! समर्पण! अंजुली बांधना! प्रेम से पीने की तैयारी!

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“सुसाइड की जरुरत नहीं, संन्यास लो !” – ओशो

तुम सूइसाइड क्यों करना चाहते हो? शायद तुम जैसा चाहते थे, लाइफ वैसी नहीं चल रही है? लेकिन तुम ज़िन्दगी पर अपना तरीका, अपनी इच्छा थोपने वाले होते कौन महो? हो सकता है कि तुम्हारी इच्छाएं पूरी न हुई हों? तो खुद को क्यों खत्म करते हो, अपनी इच्छाओं को खत्म करो। हो सकता है तुम्हारी उम्मीदें पूरी न हुई हों और तु परेशान महसूस कर रहे हो।

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