“Spiritualism, Religion and Politics” – OSHO

QUESTIONER: KRISHNA WAS ESSENTIALLY A SPIRITUAL MAN, BUT HE FREELY TOOK PART IN POLITICS. AND AS A POLITICIAN HE DID

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“धर्म से धार्मिकता की ओर” – ओशो सिद्धार्थ

पहले तो यह समझें कि धर्म क्या है और धार्मिकता क्या है? धर्म के दो आयाम हैं- एक कट्टरता और दूसरा धार्मिकता। कट्टरता – जहाँ धर्म रुक जाता है। धार्मिकता – जहाँ धर्म प्रवाहित रहता है। कट्टरता कर्मकाण्ड में ले जाती है। धार्मिकता जीवन्तता में ले जाती है।

धर्म या तो आगे बढ़ेगा या पीछे जायेगा। अगर धर्म जीवन्त नहीं हो तो कट्टरता उसकी नियति है। तो पहली बात कि धर्म अपने आप में, स्वतन्त्र रूप में व्याख्येय नहीं है। धर्म का कौन-सा स्वरूप धार्मिकता का स्वरूप है, और कौन-सा रूप कट्टरता का स्वरूप है? जब भी कोई बुद्ध पुरुष आता है, जब भी कोई सद्गुरु आता है, जब भी कोई पूरा गुरु होता है, उस धर्म में तो धार्मिकता पैदा होती है और जब वह विदा हो जाता है, तो उसके पीछे एक राख रह जाती है और कट्टरता से कर्मकाण्ड का जन्म होता है।

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