“सत्य की खोज की दिशाएं: विचार और दर्शन” – ओशो

सत्य की खोज की दो दिशाएं हैं- एक विचार की, एक दर्शन की। विचार-मार्ग चक्रीय है। उसमें गति तो बहुत होती है, पर गंतव्य कभी भी नहीं आता। वह दिशा भ्रामक और मिथ्या है। जो उसमें पड़ते हैं, वे मतों में ही उलझकर रह जाते हैं। मत और सत्य भिन्न बातें हैं। मत बौद्धिक धारणा है, जबकि सत्य समग्र प्राणों की अनुभूति में बदल जाते हैं। तार्किक हवाओं के रुख पर उनकी स्थिति निर्भर करती है, उनमें कोई थिरता नहीं होती। सत्य परिवर्तित नहीं होता है। उसकी उपलिंध शाश्वत और सनातन में प्रतिष्ठा देती है।
विचार का मार्ग उधार है। दूसरों के विचारों को ही उसमें निज की संपत्ति मानकर चलना होता है। उनके ही ऊहापोह और नए-नए संयोगों को मिलाकर मौलिकता की आत्मवंचना पैदा की जाती है, जबकि विचार कभी भी मौलिक नहीं हो सकते हैं। दर्शन ही मौलिक होता है, क्योंकि उसका जन्म स्वयं की अंतर्दृष्टि से होता है।

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“मनुष्य बेचैन, परेशान क्यों है ?” – ओशो

तुम देखते हो, यहां वृक्ष बेचैन नहीं हैं। यहां प्रशु – पक्षी बेचैन नहीं हैं। यहां सिर्फ मनुष्य बेचैन है। यहां चट्टानें बेचैन नहीं हैं। मनुष्य को छोड्कर सारी प्रकृति शांत है। सब ठीक है। जैसा होना था वैसा है। मनुष्य भर में एक तनाव है – एक गहरा तनाव है! जैसा होना चाहिए वैसा नहीं है। और इस तनाव से दो रास्ते निकलते हैं – एक रास्ता राजनीति का और एक धर्म का। जैसा है वैसा नहीं है, तो मनुष्य सोचता है : वैसा करके दिखा दूं ! उससे राजनीति पैदा होती है। तो तलैया को मानसरोवर बना लें, और क्या करें, कीचड़ छांटें, तलैया को स्वच्छ करें। यही तो है सोशलिज्‍म, कम्यूनिज्म और दुनिया के सारे राजनीतिक सिद्धांत। आशा क्या है। आशा यह है कि किसी तरह हम ठीक कर लेंगे। वैसा कर लेंगे जैसी हमारी आकांक्षा है।

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“दुख से महासुख की ओर” – ओशो सिद्धार्थ

संसार इस मृगमरिचिका में पड़ा है कि कर्म से सुख मिलता है। लेकिन कर्म से सुख मिलता नहीं। सुख बाहर से मिलने की चीज़ ही नहीं है। ‘सुखस्य दुखस्य नवकोपिदाता, परोददाति इति विमूढ़चेता।’ सुख बाहर से मिलता नहीं। इसीलिए चौथा आर्य सत्य मैं कहना चाहूंगा कि सुख उपाय से नहीं मिलता, क्योंकि सुख बाहर से नहीं मिलता। अगर बाहर से मिलता हो, तो कुछ उपाय किए जा सकते हैं। लेकिन सुख बाहर से मिलता नहीं। इसलिए सुख का कोर्इ उपाय नहीं हो सकता। सुख जीवन की सहज अवस्था है। जिसको ओशो कहते हैं-‘परमात्मा तुम्हारा स्वभाव है।’ सुख तुम्हारा स्वभाव है। ‘आनंद आमार गोत्रा, उत्सव आमार जाति।’ आनंद तुम्हारा बीज है। सुख तुम्हारा बीज है। सुख अभी, यहीं और अकारण है। याद रखना सुख का कोर्इ कारण नहीं है। दुख का कारण है। सुख का कारण नहीं है। दुख का कारण क्या है-कामना।

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“सत्य की खोज क्यों?” – ओशो

अनेक लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि जीवन में सत्य को पाने की क्या जरूरत है? जीवन

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“Satyam, Shivam, Sundram” – OSHO

Satyam means the truth — not what you think about it, but what it is; not your idea about it, but its reality. To know this truth you have to be utterly absent.
The second word, shivam, means virtue — all that is good, all that is valuable, all that is the most precious in you, the ultimate good. The man who comes to experience the truth starts living the truth immediately.
Sundram means beauty. So this is the mystic trinity: satyam, the truth; shivam, the good, the divine; and sundram, the beauty.

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“सत्य की प्यास” – ओशो

“सत्य की प्यास” सौभाग्य है उन लोगों का, जो सत्य के लिए प्यासे हो सकें। बहुत लोग पैदा होते हैं,

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