“मनुष्य बेचैन, परेशान क्यों है ?” – ओशो

तुम देखते हो, यहां वृक्ष बेचैन नहीं हैं। यहां प्रशु – पक्षी बेचैन नहीं हैं। यहां सिर्फ मनुष्य बेचैन है। यहां चट्टानें बेचैन नहीं हैं। मनुष्य को छोड्कर सारी प्रकृति शांत है। सब ठीक है। जैसा होना था वैसा है। मनुष्य भर में एक तनाव है – एक गहरा तनाव है! जैसा होना चाहिए वैसा नहीं है। और इस तनाव से दो रास्ते निकलते हैं – एक रास्ता राजनीति का और एक धर्म का। जैसा है वैसा नहीं है, तो मनुष्य सोचता है : वैसा करके दिखा दूं ! उससे राजनीति पैदा होती है। तो तलैया को मानसरोवर बना लें, और क्या करें, कीचड़ छांटें, तलैया को स्वच्छ करें। यही तो है सोशलिज्‍म, कम्यूनिज्म और दुनिया के सारे राजनीतिक सिद्धांत। आशा क्या है। आशा यह है कि किसी तरह हम ठीक कर लेंगे। वैसा कर लेंगे जैसी हमारी आकांक्षा है।

Read more

“दुख से महासुख की ओर” – ओशो सिद्धार्थ

संसार इस मृगमरिचिका में पड़ा है कि कर्म से सुख मिलता है। लेकिन कर्म से सुख मिलता नहीं। सुख बाहर से मिलने की चीज़ ही नहीं है। ‘सुखस्य दुखस्य नवकोपिदाता, परोददाति इति विमूढ़चेता।’ सुख बाहर से मिलता नहीं। इसीलिए चौथा आर्य सत्य मैं कहना चाहूंगा कि सुख उपाय से नहीं मिलता, क्योंकि सुख बाहर से नहीं मिलता। अगर बाहर से मिलता हो, तो कुछ उपाय किए जा सकते हैं। लेकिन सुख बाहर से मिलता नहीं। इसलिए सुख का कोर्इ उपाय नहीं हो सकता। सुख जीवन की सहज अवस्था है। जिसको ओशो कहते हैं-‘परमात्मा तुम्हारा स्वभाव है।’ सुख तुम्हारा स्वभाव है। ‘आनंद आमार गोत्रा, उत्सव आमार जाति।’ आनंद तुम्हारा बीज है। सुख तुम्हारा बीज है। सुख अभी, यहीं और अकारण है। याद रखना सुख का कोर्इ कारण नहीं है। दुख का कारण है। सुख का कारण नहीं है। दुख का कारण क्या है-कामना।

Read more

“सत्य की खोज क्यों?” – ओशो

अनेक लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि जीवन में सत्य को पाने की क्या जरूरत है? जीवन

Read more

“सत्य की प्यास” – ओशो

“सत्य की प्यास” सौभाग्य है उन लोगों का, जो सत्य के लिए प्यासे हो सकें। बहुत लोग पैदा होते हैं,

Read more
%d bloggers like this: